Shad anmol

डीएवी इंटर कालेज के कुछ यादगार पल

कॉलेज/स्कूल…ये नाम जब भी हमारे ज़ेहन के सुनहरे पर्दे पर उभर कर आता है, वैसे ही हमारे होंठों पर एक बेसाख्ता मुस्कान आ ही जाती है. कॉलेज के उन दिनों को याद करके शायद ही कोई होगा जिसकी आंखों में उन दिनों की बेफ्रिक्री को दोबारा जीने की ललक ना दिखती हो. इस भागदौड़, पैसे कमाने और करियर बनाने की रेस में आने के बाद पता चला कि शायद जिंदगी के कुछ ऐसे खूबसूरत लम्हे पीछे छूट गए हैं जिन्हें दोबारा जीने का मलाल जिंदगीभर रहेगा, शायद दिल की आखिरी धड़कन तक. चाहे आज कही भी हो लेकिन कॉलेज के दिनों की कुछ ऐसी बातें हैं जो भुलाए नहीं भूलती या यूं कहें कि हम उन बातों को कभी भूलना नहीं चाहते. कई ऐसी छोटी छोटी यादें होती हैं जिन्हें हम ताउम्र संजोकर रखना चाहते हैं. ऐसी ही कुछ यादें हैं जिन्हें हमने पिरोने की कोशिश की है.

हमारे कालेज की स्थापना 8 अगस्त 1940 की गई,आज 80 बरस हो गए बने हुए

हमारे principal का नाम देव भास्कर तिवारी है, नाम से पता लग गया होगा कैसे होंगे, सिर्फ उनके बेटे को छोड़ कर शाय़द ही कोई बचा हो जो उनको गाली न दिया हो

क्या लिखें ? दिल खिल जाता है.. ज़िन्दगी का सबसे बेहतरीन साल गुज़रा DAV में.. पढ़े, लिखे, बदमाश किये, पटाये, सस्पेंड हुए, खेले खुदे, फूल तोड़े और कई संगीन अपराध किये.. जहाँ जहाँ से याद आता है यही याद आता है कि केतना लंठ लंठ लइकन सब था क्लास में ! शैलेन्द्र सर का बात अलग है, उनसे पढ़ते थे इस लिए काहे की उ मारते बहुत गंदा थे, पुलिसिया मार! और भी बहुत से टिचर्स वो भी माशाअल्लाह थे क्या बताऊं उनके बारे में.

हमारे कालेज में एक ग्रुप होता था आना, जाना, खाना, पीना सब साथ होता था, सुबह के टाइम सबसे पहले हम सब Ground में इकट्ठा होते थे, और बेवजह ज़ोर ज़ोर से हंस रहे होते थे क्लासरूम कि हमारी एंट्री इक्जैकट अटेंडेंस के टाइम पर होती थी‌ और पढ़ने की जल्दी किसे होती थी।

लगा तो इस ग्रुप को बनाने में, उन बेवकूफों का थोड़ा समझाने में,ज़रा भी वक्त लगा नहीं इन कमीनों से अलग होने में,पहले अजनबी थे फिर दोस्त फिर अजनबी यह जिंदगी भी आखिर क्या क्या करवा जाती है लगा नहीं था कभी ऐसा भी होगा यार उन हरामखोरो की बहुत याद आती है, मैं हमेशा सिनियर्स लोगों को एडवाइज़ देता था कि दिल से अच्छा बनो शक्ल से तो मेरा चूतिया दोस्त भी अच्छा है, जब कभी भी मुझे डिप्रेशन की वजह से आत्महत्या करने का सोचूं तो अपने दोस्त का फोटो देखता तो यही कहता जब ये चूतिया जिंदा है तो मैं क्यूं मरूं।

मै अपने दोस्तों को कभी नहीं छोडूंगा क्योंकि मेरा कचरा मेरी जिम्मेदारी, प्यार मेरे दोस्त को होता था और मूड मेरा ख़राब होता था और रोज़ उसकी गर्लफ्रेंड नाराज़ हो जाती थी वो जानती थी कि ये चूतिया उसे मनाएगा ज़रूर

गाली देना बुरी बात नहीं गाली सुनना बुरी बात है

अरे यार हे गूगल ये आटो करेक्शन को समझा दो गाली जैसे लिख रहा हूं वैसे ही टाइप कर भोंचू

कॉलेज का पहला क्रश जिसे देखने के बाद पहली बार फिल्मों की तरह पीछे से वायलन की आवाज सुनाई दी थी हमें. सब कुछ यशराज फिल्म्स की रोमांटिक फिल्म की तरह हो रहा था. उसकी सफेद सलवार सूट और लाल दुपट्टा आज भी कई बार यादों के झोंके के साथ हमारे दिल को छू जाता है.

(नोट: यहां ‘पहला’ शब्द का प्रयोग इसलिए क्योंकि क्रश तो बहुत हुआ लेकिन हर बार दिल क्रश ही हुआ.)

10th में आने के बाद भाई होमवर्क एंड आल यह सब बच्चों की चीजें हैं प्राईमरी स्कूल में नहीं करी और यह सब तो 10th में करवाना चाहते हैं लेकिन भाई जब नहीं करते थे तो पिटते बहुत थे इसलिए क्लास के टॉपर से सेटिंग में बैठा रखी थी अब हर क्लास के कुछ बच्चे होते हैं जो जैसा काम करते हैं उनके वही नाम दे दिया जाता है हमारी क्लास में एक भाई साहब थे कालेज के 3 साल हमने उनसे फैन और लाइट ऑन आफ करवाई जिसकी वजह से उनका नाम भी बिजली विभाग पड़ गया जिसे facilities काम ज्यादा करवाते थे उसका नाम चपरासी पड़ गया मेरे साथ अफेयर के चर्चे भी होते थे खैर अफेयर की बात शुरू करूंगा तो कई दोस्तों की पोल खुल जाएगी और चले आएंगे मेरे घर आकर चिल्लाने लगेंगे ‘निकल भो श्री वाले तुने मेरे सिक्रेट अफेयर के बारे में क्यूं लिखा’ खैर जाने दो

कालेज में खुद को स्कालर समझते थे क्योंकि कोचिंग हमेशा कालेज से आगे ही होता है, क्लास में सवाल उठा तो बगल वाले दोस्त को रौब से समझाते थे “अरे मैं बताता हूं इसका उत्तर मुझे आता है” और वो टापर जो इंटरवल में भी कापी किताब में घुसडे रहते थे क्या वो बिल गेट्स बन गए? बनही गये होंगे, है न ?

और हम तो पढ़ने में उतने अच्छे थे नहीं ब्लैक लिस्ट का टैग लगाकर बैकबेंचर कहलाते थे

सबसे मजे की बात लेट होने पर चपरासी को रिश्वत के नाम पर क्या क्या नहीं देना पड़ता तो कभी-कभी चैनी खैनी, गुटखा न जाने क्या क्या।

पेन फाइट से लेकर कितने गेम हम पीछे खेला करते थे कभी चार्टडस्टर वाला क्रिकेट तो कभी बुक क्रिकेट खेलना कभी चाक के छोटे-छोटे टुकड़े एक दूसरे पर फेंकते थे कार्टून के समोसे वॉशरूम में सबका साथ जाना आदि पीरियड वही बिताना वह छोटी-छोटी लड़ाई होने पर “स्कूल के बाहर मिल भो श्रीके” कह कर एक दूसरे को चिढ़ाने ये सारी बातें आंखों के सामने आकर चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान छोड़ जाते हैं

इक रोज़ यूँ हुआ कि मॉनिटर का चयन होना था और क्लास टीचर ने कहा जो बनना चाहता खड़े हो जाये और मैं खड़ा हुआ

ना ना मॉनिटर बनने को नहीं

सुसु की परमिशन माँगने को खड़ा हुआ

शायद हर लड़के का कॉलेज ऐसा ही होता है, शायद हर कालेज यही सिखाता है, शायद हर कॉलेज आपको तराशता है , शायद हर कालेज डीएवी सा होता है , बस लोग किसी और नाम से याद करते हैं, आई रियली मिस यू कॉलेज डे

सबसे भयानक हादसा हुआ 11th में जब मेरे दोस्त बिछड़ गए बायो साइड और मैथ साइड में, मैं और कुछ पकाऊ दोस्त बायो साइड में हो गये,

केमिस्ट्री, फिजिक्स और बायो की लैब में 3-4 लोग प्रैक्टिकल करते थे बाकी लोग लंढई करते थे रोज़ की तरह,कॉलेज के दिनों में सबसे ज्यादा पैसे प्रैक्टिकल पर खर्च हुए हैं, नोट्स, फाइल,चार्ट, फलाना लेन्स डेमाका लेन्स न जाने क्या क्या खरीदना पड़ता था, प्रैक्टिकल से मुझे इतनी उलझन होती थी कि इस बारे में और बात फिर कभी……

फिर एक दिन बहुत मज़ा आया वो था हीरक जयंती उस दिन तो सबके अंदर का फैशन हिलोर मार रहा था और लड़कियां साड़ी पहेन कर स्वरा भास्कर की भतीजी लग रही थी और वही लड़कियां क्लास में पढ़ाई के दौरान उजड़ी हुई मजार की बुझी हुई अगरबत्ती लगती थी खैर जाने दो इस पर बात यही पर खत्म।

कॉलेज को वो आखिरी दिन

आखिर में वो दिन भी आ गया जिसके बारे में याद कर के आज भी आंखें नम हो जाती हैं. उस दिन सारे गिले-शिकवे किनारे रख कर एक बार गले लगने का सुख भुलाए नहीं भूलता. इस वादे के साथ कि साल में एक बार जरूर मिलेंगे, कॉन्टैक्ट बनाए रखेंगे. वैसे वादे तो कईयों ने किए थे लेकिन इतने साल बाद बहुत कम लोग ही उसे निभा पाए हैं. उस दिन सब यही कह रहे थे कि काश हम इस कॉलेज में हमेशा के लिए रह जाते, यूं हीं साथ-साथ.

चलिए जी…बहुत याद कर लिया आपने अपने कॉलेज के दिनों को. अब इस पन्ने को Minimize कीजिए और लग जाइए अपने काम पर वर्ना पीछे से तेरा बाप चिल्लाता ही होगा कि “दिन रात मोबाइल में रहता है सड़ी वाला”

सच में, कितना हसीन था वो पल जहां छोटी छोटी चीजें भी हमें एक अजीब सी खुशी दे जाती थी और आज उन्हीं बातों को हम अपना बचपना कह कर टाल देते हैं.

~शाद अनमोल 🌚

No comments to show.

Rating: 1 out of 5.